हमारे प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र में काफी लोग आते है जो नहीं जानते कि नेचरोपेथी या प्राकृतिक चिकित्सा केसी होती है

किन रोगों ओर दर्द में इलाज किया जाता है ओर वो कई बार इसे आयुर्वेद के जैसा समझ लेते है।

तो इस पेज में आपको नेचरोपेथी के विषय में पूरी जानकारी दी गई है। ओर सभी ट्रीटमेंट के बारे में जानकारी दी गई है।

प्राकृतिक चिकित्सा क्या है? परिभाषा

प्राकृतिक चिकित्सा एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति है जो जीवन के शारीरिक, मानसिक, नैतिक ओर आध्यात्मिक ओर रचनात्मक सिध्दांतों का निर्माण होता है। इसमें स्वास्थ्य को बढ़ाने पर रोग निवारण करना ओर शरीर की रोगप्रतिरधक शक्ति को ओर मजबूत बनाना है।

पंचतत्व आकाश वायु अग्नि जल पृथ्वी की मदद से प्राकृतिक चिकित्सा के साधनों द्वारा शरण के बीच जातीय द्रव्य को बाहर निकालने की क्रिया में मदद करना ही प्राकृतिक चिकित्सा है।

प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र में शरीर में से दूषित तत्वों विशतत्वों को शरीर के बाहर निकाला जाता है ओर पोषक तत्वों का निर्माण ओर बढ़ान पर पूरा जोर लगाया जाता है।

नेचरोपैथी Do Not Harm यानी शरीर को किसी भी प्रकार से हानि नही पहोचाने पर जोर दिया गया है।

प्राकृतिक चिकित्सा का इतिहास

पुराने समय में जब चिकित्सा विज्ञान इतना विकसित नहीं हुआ था बीमारियों को भिन्न-भिन्न रूपों में देखा जाता था कोई इन्हें देवताओं का श्राप मानते थे और कोई अपने को कर्मों का फल मानते थे।

कुछ लोग मृत विश्वास का शरीर में आकर रोना ही बीमारी मानते थे। इसलिए चिकित्सा या उपचार करते समय मारना झाड़-फूंक करना शरीर को जलाना या दागना और कहीं-कहीं देवी देवताओं को प्रसन्न करने में लिए बली चढ़ाई जाती थी,

आज चिकित्सा विज्ञान काफी विकसित हो चुका है एलोपैथी चिकित्सा में हर प्रकार के रोगों के लिए कुछ ना कुछ चिकित्सा या ऑपरेशन उपलब्ध है फिर भी आज हम कोरोना और ऐसी कई लाइलाज बीमारियां ठीक नहीं कर पा रहे हैं।

एलोपैथिक चिकित्सा अकस्मात और गंभीर रोग जिसमें तुरंत ऑपरेशन अनिवार्य हो उसमें आवश्यक है किंतु प्राकृतिक चिकित्सा शरीर के प्राकृतिक ढांचे को कम हानि पहुंचा कर बिना ऑपरेशन के सभी प्रकार के दर्द और रोगों को ठीक करने का प्राधान्य देता है।

प्राकृतिक चिकित्सा vs एलोपैथी चिकित्सा

एलोपैथिक चिकित्सा मैं रोगों को ठीक करने के लिए शरीर में कीटाणुओं को मारने से ही रोग ठीक हो जाएगा इस विचार से गोलिया या इंजेक्शन दिए जाते हैं। कीटाणुओं को मारने के लिए जो औषधिया दी जाती है, अबे काफी जहरीली और खतरनाक होती है। कीटाणुओं को मारने के साथ-साथ इन औषधियों से शरीर में कुछ अन्य परिवर्तन भी होते देखे गए हैं। जो कभी-कभी बीमारी से भी ज्यादा खतरनाक होते हैं इन्हें साइड इफेक्ट या आफ्टर इफेक्ट कहा जाता है।

इससे आधुनिक चिकित्सा या एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति कहा जाता है।

प्राकृतिक चिकित्सा vs आयुर्वेद चिकित्सा

आयुर्वेद आज भी अपने तीन सिद्धांत वात पित्त कफ पर कायम है इसमें भी कम ज्यादा दवा पर निर्भर रहना पड़ता है कभी कभी कि नहीं कि नहीं जीर्ण रोगों में अच्छी तरह निदान होने से उपचार से अच्छे परिणाम भी देखने में आते हैं।

इससे कुछ लोग निर्दोष चिकित्सा मानते हैं वात पित्त कफ तीनों के असंतुलन को ही बीमारी का कारण मानकर कुछ ऐसी औषधीय दी जाती है जो कम निर्दोष मानी जाती है।

पंचमहाभूत ओं के सिद्धांत पर भी इनका जोर रहता है। एनिमा स्टीम बाथ वुमन धोती नेति आदि भी करा कर शरीर शोधन का काम कराया जाता है।

कभी-कभी कुछ लोग 12 क्षारो से शरीर के असंतुलन को ठीक करने की कोशिश करते हैं।

इन चिकित्सकों से शरीर की पीड़ा कम ज्यादा होती देखी जाती है परंतु पूर्ण स्वास्थ्य नहीं मिलता क्योंकि इन पद्धतियों में आहार नहीं बदला जाता है।

मात्र आयुर्वेद में ही कुछ बदला जाता है जबकि आर बदलना ही शरीर के शोधन में मदद करता है।

इसलिए जब तक रोगी का आहार परिवर्तन ना हो तब तक क्या अच्छा स्वास्थ्य संभव है? खाना गलत रहे और उससे गलत खाने के कारण जो पीड़ा हो वह मिलती रहे, तो क्या शरीर ठीक रह सकता है?

आज की यही स्थिति है मात्र आराम के लिए हम दवाओं पर जी रहे हैं।परंतु इन चिकित्सकों के अतिरिक्त एक ऐसी भी चिकित्सा पद्धति है जो शरीर को पीड़ा मुक्त ही नहीं करती, बल्कि शरीर को बाद में स्वास्थ्य सुंदर सुडोल और शक्तिशाली भी बनाती है।

इस चिकित्सा पद्धति में दबाव का प्रयोग नहीं किया जाता है वरन शरीर की कमियों को प्राकृतिक रूप से पूरा करके शरीर को स्वस्थ और सुंदर बनाया जाता है।

इस चिकित्सा को जो प्राकृतिक साधनों मिट्टी पानी धूप हवा भोजन तथा उपवास आदि से शरीर को शुद्ध करके स्वास्थ्य लाभ कराती है। इससे प्राकृतिक चिकित्सा कहते हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा शरीर के स्नायु तंत्र की थकान मिट आत है और यही बीमारी का सबसे बड़ा कारण है। या शरीर के विष को बाहर निकलती है।

शरीर की टूट-फूट को पूरा करती है और शरीर इस प्रकार साफ होकर जब सुंदर और स्वस्थ बनता है, तो यही सच्ची प्राकृतिक चिकित्सा है। प्राकृतिक चिकित्सा ही केवल एक चिकित्सा पद्धति है जो जर्जर शरीर को प्राकृतिक साधनों से ठीक करके सुडोल बनाती है।

प्रथम प्राकृतिक चिकित्सा ही क्यों?

जब प्राकृतिक चिकित्सा इतनी प्रभावी और लाभदायक उपचार पद्धति है, तो क्यों नहीं इनका इतना प्रचार होता, जितना एलोपैथी का है। वास्तव में यह चिकित्सा संयम पर आधारित है, जो आज समझ में संभव नहीं दिखता है।

एलोपैथी का सिद्धांत है खूब खाना जो भी जैसा मिले खाना और यदि कुछ गड़बड़ हो जाए तो दवा से दबा देना। यह सब को अच्छा लगता है और आसानी भी है खाने में गलती हम करें सिगरेट बीड़ी हम पिए और डॉक्टर उसका उपचार कर दे तो हमें सोचने समझने की क्या जरूरत है?

यही वजह है कि रोगी सब कुछ खाता है और उसकी चिंता डॉक्टर करता है। आज संयम हीन जीवन को पीड़ा रहित रखना ही औषधि विज्ञान का काम है।

कुछ लोग जो वास्तव में स्वस्थ होना चाहते हैं और स्वस्थ रहना चाहते हैं वह इस चिकित्सा पद्धति प्राकृतिक चिकित्सा में आते हैं। ऐसे रोगी अपने रोगों से मुक्ति पाते ही हैं साथ ही शरीर भी नए हो जाते हैं।

इसलिए संयम समय और संपत्ति की जरूरत पड़ती है जिन प्रभाव से दवाओं से शरीर की बीमारी दबा दी थी, उसको निकालना और बाद में बीमारी ठीक करना प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति का ही काम है।

इसलिए प्राकृतिक चिकित्सा में रोगी का दौरा उपचार करना पड़ता है इसलिए इसमें देर लगती है। उभार आते हैं, पीड़ा सहनी पड़ती है जिस प्रकार तपाने से सोना शुद्ध हो जाता है उसी प्रकार शरीर भी प्राकृतिक चिकित्सा से शुद्ध होता है।

प्राकृतिक चिकित्सा रोग की जड़ों को काटती है। जड़ कट जाने से जैसे वृक्ष अपने आप धराशाई हो जाते हैं। उसी प्रकार हमारे रोग में भी इस चिकित्सक से शरीर सफाई होने के बाद या कहे रोग का कारण दूर करने से रोग अपने आप चले जाते है।

प्राकृतिक चिकित्सा यह मानती है कि रोगों की जड़ या कारण नाडी मंडल की थकान है, जिसे अंग्रेजी में Ennervation कहते है। नाड़ीया हमारे शरीर के हर भाग में कार्यरत है।

इनकी वजह से शरीर के अवैध कार्य करते हैं। इन नाडीयों की शक्ति, जो सब अंगों को सतत मिलती रहती है, कम होने से शरीर का चयापचय गड़बड़ा जाता है।

शरीर को जो चाहिए वह मिलता नहीं और जो बाहर जाना चाहिए वह बाहर जाता नहीं यानी शरीर के आंतरिक स्त्राव और विसर्जन अव्यवस्थित हो जाते हैं।

यही अव्यवस्था जिससे शरीर के विष शरीर में रुकने लगते हैं वह बीमारी को जन्म देता हैं।

परंतु कोई भी उपचार पद्धति शुरू में इस थकान को नहीं पहचानती । दफा हो या खानों से शरीर को उत्तेजित करके शर्ट की रिजर्व फोर्स को निकालकर या दर्शाने का प्रार्थना किया जाता है की रोक ठीक कर लिया गया है, क्योंकि रिजर्व शक्ति के आ जाने से थोड़ी शक्ति का भास होता है।

परंतु प्राकृतिक चिकित्सा शुरू में ही इसको मानकर रोगी को मानसिक शारीरिक इंद्रियों और आंतरिक अवयवों का आराम देना शुरु कर देती है।

इन चारों आराम का मेंटल फिजिकल सेंसनियम का नाम उपवास यानी फास्टिंग है

जो भूखा मरना नहीं है बल्कि उपचार शुरुआत की पहली कड़ी है जिस पर शरीर का स्वास्थ्य आधारित है उपवास इस चिकित्सा का अच्छे से अच्छा और प्रभावि ओजर है जो ऊतक समय पर उचित मात्रा में रोगी की शारीरिक स्थिति को देखकर करना।

जो लोग पानी पर उपवास करने से डरते हैं, उन्हें र सहारिया पर दूध पर रख कर भी आराम करा सकते हैं, साथ में बाया उपचार के रूप में जल उपचार और मिट्टी की पट्टी अभी इस्तेमाल की जा सकती है।

प्राकृतिक साधनों मिट्टी पानी धूप हवा और फलों का रस या फल दूध पर रखकर जब शरीर की शक्ति इकट्ठी की जाए और शरीर शुद्ध हो वही प्राकृतिक चिकित्सा है।

भूखे मरना या मिट्टी पानी पर रखना ही मात्र प्राकृतिक चिकित्सा नहीं है। परंतु शरीर की आवश्यकता क्या है, इस को ध्यान में रखकर यदि ऊपर के उपचार दिए जाए तो यही प्राकृतिक चिकित्सा है और स्वास्थ्य लाभ का सच्चा ओर सरल तरीका है।

प्राकृतिक चिकित्सा के प्रमुख सिद्धांत।

रोगों की एकरूपता कारणों की एकरूपता निवारण की एकरूपता।

रोगों का कारण कीटाणु नहीं।

तीव्र रोग शत्रु नहीं मित्र होते हैं।

प्रकृति स्वयं चिकित्सक है।

चिकित्सा रोग को नहीं रोगी के पूरे शरीर की होती है।

शरीर मन तथा आत्मा तीनों की चिकित्सा होती है।

प्राकृतिक चिकित्सा में औषधियों का कोई स्थान नहीं है।

प्राकृतिक चिकित्सा में हर रोग की चिकित्सा है हर रोगी कि नहीं।

चिकित्सा में उपचारात्मक उभाद आता है।

जीवन रोग के उपचार में समय लगता है।

प्राकृतिक चिकित्सा का मुख्य सिद्धांत है रोगों की एकरूपता कारण की एकरूपता और निवारण की एकरूपता